यू तो मुझपे अंग्रेजी का भुत सवार था ,न जाने कब एक छोटे से कस्बे से निकलकर मैं चमचमाते सहर में बड़ा हो गया ,उससे भी भयानक था वहाँ की सड़के, बिल्कुल मेरे बचपन से लेकर जवानी तक कि कहानी की तरह मुड़ी हुई । कोई छोर नही था उसका , उम्मीदों का बोझ और सहर की आपाधापी में सबकुछ व्यस्त हो गया था , वो निराश चेहरे , रात के अंधेरे में अधपकी आंखे और टिमटिमाते बल्ब ,बस यही था जो रोज़ मेरे सामने था । " कहा जाना है " मेरे ध्यान को काटते हुवे बस कंडक्टर ने मुझसे पूछा । कुछ पल में मैं जीवन के 25 वर्ष जी चुका था । सबकुछ से गुजर चुका था जिसे मैंने देखा था । " ये बस जाती है कहा है ? ,मैंने कड़क आवाज़ वाले कंडक्टर से पूछा, जो शायद आस पास के गांव से ही था । वो बोला " भाई तन्ने जाना कहसिक है ?? सच कहु तो इस भाषा का मैं आदि नही था , उसी मिट्टी में जीवन के दो दसक गुजार देने के बाद भी मैं कभी रम नही पाया । सच कहु तो इंसान वो कभी नही बन सकता जो वो कोशिश करता है बनने की ,यहाँ ओहोदे कि बात न करे तो अच्छा होगा , मुझे याद है जब मैं घर से आया तो पिताजी ने कहा था बेटा कभी मेरा नाम मत मिटने देना ,तुम्हे बढ़ा आदमी बनाना हैं, ऐसा की लोग तुम्हे सलाम करें ,तुम्हारा आदर करे , सब बात समझ में आई पर ये समझ नही आया कि आदमी बडा हो तो ही सलाम और सम्मान है , बचपन में सिखाया था कि कभी सच्चाई का दामन मत छोड़ना, सच सबसे बड़ा सम्मान है ,फिर बड़ा होते ही वो पाठशाला और वहाँ का मास्टर दोनो बदल गए । सबकुछ साफ था कि आदमी हो या न हो पर बड़ा आदमी जरूर हो , समाज की ये नीति समझ नही आई ....20 से ज्यादा औधोगिक इकाइयों में interview देने के बाद मालूम चला कि इस शहर में आदमी वाकई बड़ा है , सब का एक ही सवाल था , की आपके पास कोई एप्रोच या रिफरेन्स है , सच कहु तो हमारे सहर में इसे घर मे बुलाके पता पूछना बोलते है , चमचमाती गाड़िया थी ,ऊंची ऊंची मीनारे थी , बस एक छोटा सा अरमान था बस वही टूट रहा था इस सहर में,।
मुझे एक वाक्या याद है पहली बार जब मैंने उसको देखा था तो लगा कि वक़्त यही ठहर जाए , सबकुछ रुक सा गया ,सिवाए मेरी कल्पनाओ के । सच कहू तो ये जो 18 सब 25 की उम्र होती है ना इसे लोटे की तरह लिया जाना चाहिए , पेंदी तो है पर अगर एक बार जो लुढ़का तो फिर कभी शायद ही खड़ा हो । बस कुछ ऐसी ही थी जिंदगी । मिली वो बाते, भी हुई और इजहार भी हुआ , लगने लगा कि बस्ती का मलिन धुवा एक दिन साफ होकर स्वच्छ सांस बनेगा , पर मैं गलत था ,क्यो न होता वो था ही शहर बड़े लोगो का । सच कहु तो जब भूख की आंच पर शरीर तपता है तो ख्वाब धरासाई हो जाते है । 21 से ज्यादा कोशिशो के बाद भी मैं टूटा नही था ,पर जो न टूटा वो उसने तोड़ा, हा वही जो आंखों में था , जुबान पर था । गांव में कहावत है कि राम का नाम ,राम से बड़ा , बस इतना ही याद था मुझे । अचानक से जोर की आवाज़ आई और मैं औंधे मुंह गिरा ,हा मैं अपनी कल्पनाओं से बाहर आ चुका था , पता चला तो मालूम चला कि मुनिसिपल वालो ने पूरा शहर खोद दिया है , शहर में जगह जगह फ्लाईओवर बन रहा है ,गाड़िया सरपट दौड़ेगी , लोग का वक़्त बचेगा ,पूरा शहर भर जाएगा बस कुछ नही भरेगा तो वो शहर के गड्ढे और मेरा दिल । सपने तो मैं रोज़ देखता हूं ,पर अब किसी से पता नही पूछता ,कदमो ने हर रास्ते नाप लिए है .....
(पात्र और घटनाये काल्पनिक है , इनका किसी से किसी रूप में सम्बन्ध नही)
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