उल्फत के दौर में हम क्या क्या नही हारे ,
न साहिलों का सैलाब मिला न ,न मिले नदी किनारे..
टकरा के हम खुदी से इश्क़ कर बैठे
वो हो गए सभी के ,बस न हुवे हमारे ....
जो अंजुमन में यू ही चराग जलता रहा
छट गई काली घटा ,छ्टे न आंसू हमारे
न था पास कुछ भी खोने का डर था जैसे
उलझा हुआ था दिल ,रिश्तो के बीच जैसे-तैसे
न जिंदगी रही,न टूटता तारा रहा
बुझ गए हम, दिया बुझे है जैसे
@anonymous@dil_$se






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